Wednesday, July 19, 2017

मैं खुश रहना चाहती हूँ

मै ,
खुश रहना
चाहती हूँ
हर पल

इसलिए
मिलती हूँ
फूलों से ,

खेलती हूँ
हवाओँ  से.

चहकती हूँ
पंछियों के   साथ।

किसी गीत के
बोल गुनगुनाती हूँ ,

दीवानों के
  मन मे डुबकी
लगाती हूँ

और
रंग देती हूँ
शब्दों को
इश्क के
रंग में  !!

मै ,
हकीकत की
जमीन को
ठोकर मार के

थोड़ी दूर
ख्वाबो के
साथ उड़
जाती  हूँ

बस इसलिए
कि मै
ख़ुश रहना
चाहती हूँ !!

- सीमा श्रीवास्तव

जो हुआ सो सही ही हुआ

नहीं पता कि जो हुआ
वो कितना सही हुआ
पर जो भी हुआ
वो होता चला गया!

ये नदियाँ जैसे बहती
चली गईं।
ये पौधे जैसे पेड़
होते गए!
कलियाँ जैसे करवट बदल कर
फूल बन गईं!
पत्थर घिस - घिस के
रेत होते रहे
और समन्दर सूख के
भाप से बादल!

हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही  हुआ
हाँ, जो हुआ सो सही ही हुआ!

- सीmaa

Sunday, July 16, 2017

संगीत

स्त्रियाँ अपने काजल से
रच लेती है आँखों में
कुछ रंगीन सपने,

हाथों की मेंहदी में
लिख लेती है
गजल और
गुनगुनाती है
जिंदगी की ताल पर
अपनी पसंद का कोई गीत!

अपने ख्वाबों में
झालर लगाकर वो रोज
उन्हें लहराती हैं
और छेड़ती हैं
मन के तारों पर
मधुर संगीत!

-सीmaa

साजिश

तुम जब साजिशें रच रहे होगें
मैं तितलियों के पंखों के रंग गिन रही हूँगीं!

तुम जब पानी में जहर  मिला रहे होगे
मैं नदी में अपने  पैर डुबा कर
छप-छपाछप कर रही हूँगीं!

तुम जब  दुनिया के सारे मासूम चेहरे को
मसलने का सोच रहे होगे
मैं अपनी कूची उठाकर बना रही हूँगीं
नींद से उठकर आँखें मलता एक बालक!

- सीmaa

Tuesday, July 4, 2017

पेड़

पेड़ के नीचे
बैठ कर देखना
ये उसकी मर्जी है कि
वो तुम्हें फूल देता है,
फल देता है या
सूखे पत्ते
और तुम कोई इच्छा
ना भी रखो तो
उसकी छाँव तले तो रहोगे ही!
सीmaa

प्यार

इतना लड़ - झगड़ के भी
क्या पाना चाहता है दिल
बस थोड़ा सा प्यार
और क्या!
- सीmaa

Sunday, July 2, 2017

प्रलय


जब अपने लिए
थोड़ी खुशियाँ बटोरने निकली
तब प्रलय-प्रलय का
हाहाकार हुआ!

लोग जब भिड़े  हुए थे
क्रांति  में
मैंनें बीज बोया था प्रेम का,
शांति का!

जिंदगी की
इतनी लड़ाईयाँ लड़ने के बदले
अगर थोड़ा सा भी प्रेम पा सकूँ तो
प्रलय के बाद रुह भटकेगी नहीं!

ये देह मिट्टी में मिल कर भी
चंदन सी महकेगी तब!

- सीमा श्रीवास्तव

Saturday, July 1, 2017

तू ना सही

तुम ना आओ
तो भी
आती रहेगीं
यादें अनगिनत
तू ना सही
तेरी यादें
वफादार रहीं!
- सीmaa

खाली

जब खत्म हो जाते हैं
बोरियों में कसे अनाज
औरतें सुस्ताना चाहती हैं
पर घर के
खाली डब्बे जब बिना वजन के
गिरने लगते हैं तो
औरतें एक नई लिस्ट बनाती हैं।
भर देती हैं उसमें
पहले से भी ज्यादा जरूरतें
नए-नए साबुन - शैम्पू, तेल।
डब्बे फिर भर जाते हैं
पर मन का एक हिस्सा खाली ही रहता है!
उस खाली जगह को भरने के लिए
उनका थोड़ा खाली रहना जरुरी है!
- सीmaa

चुप्पियाँ

यूँ ही रोज अपनी चुप्पियाँ छोड़ जाते हो तुम
और मैं उससे जिंदगीं के अर्थ निकाला करती हूँ
तुम्हारा होना ना होना मेरे मन की चंचलता है
तुम जो नहीं  कहते वो सुन लेती हूँ मैं
तुमने जो सोचा भी नहीं वो मेरी ख्यालों में होता है
मैं हर बार तुमसे दो कदम आगे रहती हूँ
मैं हर दिन खुद से ज्यादा तुमको जीती हूँ!
- सीmaa

Saturday, June 17, 2017

कोई भरता भय

कोई भरता भय,
कोई देता स्नेह,
कोई बेचैनी।

कोई दूर से ही
दुआ करता,
अपना स्नेहिल स्पर्श भेजता।
बिन बोले सब सुन लेता,
बिन कहे प्रेम करता,
हमें अपना समझता
पर चुपचाप रहता।
- सीमा

Wednesday, June 14, 2017

प्रेम

प्रेम आसमान में
उगे सितारों की बुनावट है,

प्रेम भोर में आँखें मलते
सूरज का प्यारा मुखड़ा है,

प्रेम नदियों की मौज है,
सागर की लहरें हैं,
फूलों की सुगंध है,
हवाओं की नमी है
पेड़ो की हरियाली है
अमलताश, गुलमोहर, पलाश है प्रेम
कुछ अजीब सा एहसास है प्रेम
महसूस करना तुम्हारे आसपास है प्रेम!

Sunday, June 4, 2017

ये क्या हुआ

ये क्या हुआ कि
सारा वजूद सिमट गया है
एक जगह ही!
ये क्या हुआ कि
मैं होकर भी हूँ नहीं कहीं!
ये क्या हुआ कि
जिसे देखना चाहा छू के
वो सच में कोई था ही नहीं!
ये क्या हुआ कि
जिंदगी मेरी होकर भी
रही तेरे पास ही!
- सीमा श्रीवास्तव

Friday, May 12, 2017

जुदाई

क्यों छीन लिए जाते हैं
प्रेम वाले शब्द
क्यों जुड़ने की जगह
जुदाई जगह ले लेती है!
हर बार पौधों की जगह
बदलने से उनके मुरझाने का डर रहता है!
ठीक उसी तरह प्रेम जब जड़े फैला ले तो
नासमझी मत करो।
किसी की जिंदगीं है ये

इससे  दिल्लगी मत करो!
- सीmaa

Tuesday, May 9, 2017

पेड़

वो एक उदास रात थी
जब तुम्हारी शाखाओं को बाँहें समझ
वो नन्हीं चिड़िया आराम से सो गई थी
आँधियों से बेखौफ
बहुत भरोसा था उसे तुमपर
तुमने भी उसके भरोसे की लाज रखी
और एक रिश्ता बन गया विश्वास का
चिड़ियाँ की रातें अब उदास नहीं थी!
उन शाखाओं में कितनी ही जिंदगियाँ थी!
सब मिल कर रहते और पेड़ का आभार व्यक्त करते
पेड़ भी बहुत खुश था कि वो अकेला नहीं
कितनी चहचहाहट थी सुबह से शाम तक!
बस  रात को पेड़ देर से सोता
सबकी देखभाल करके!
पेड़ और चिड़ियों का रिश्ता तो सदियों पुराना है!
पेड़ के दिल में  ही तो चिड़ियों का वास है!
- सीmaa

Tuesday, May 2, 2017

बचपन के दिन

नहीं पता क्यों
मेरी क्लास का सबसे साँवला और
घुंघराले बालों वाला मेरी अंग्रेजी शिक्षिका का
गुस्सैल बेटा मेरा ध्यान क्यों खींचता था!

उसकी बड़ी - बड़ी आँखें
कभी -कभी डरावनी भी लगती थी
फिर भी सारा ध्यान उसी पर!
एक दिन कबड्डी खेलते समय उसे
जबर्दस्त चोट लगी
हाथ - पैर सब छील गया
उसे चोट लगी और मेरी आँखों में आँसू
दौड़ के अपनी टीचर को बुलाने गई पर
फर्श पर पानी गिरा था
मेरे पैर  फिसले और
मैं चित हो गई

और वो निर्मोही
इतनी चोट लगने के बाद भी
मुझे देखकर
ठहाके लगा के हसे जा रहा था!
- सीmaa

बचपन के दिन

उस दिन
झूले से उतरते समय
मेरी स्कर्ट
झूले की करी में फंस कर
अच्छी-खासी फट चुकी थी!

ठीक उसी वक्त
तुम दौड़ कर बरामदे में टंगी
अपनी बहन(मेरी सहेली) की
जींस ले आए थे

और फिर
जब मैं उसे लौटाने
तुम्हारे पास आई तो
तुमने कहा
कपड़े ऐसे पहनने चाहिए
जो उलझे नहीं
फंसे नहीं।

आज भी
दुपट्टे को संभालते समय
साड़ी की आँचल ठीक करते समय
तुम अनायास ही याद आ जाते हो

बस ग्यारह की ही तो थी मैं
उस समय
और तुम तेरह के!
कुछ बातें
दिल के करीब रहती हैं
कुछ नसीहतें
हमेशा याद रहती हैं!
- सीmaa

Friday, April 28, 2017

नाटक

सोचो तो कुछ नहीं था
ना प्यार, ना नफरत
ना ख्वाब, ना कोई हकीकत
बस एक मंच था और
हमें जारी रखना था कोई नाटक
दर्शकों की मांग पर
ये दिल दिमाग की सारी
मेहनत थी
सारा  जुगाड़ वक्त ने लगाया था।
- सीmaa

Wednesday, April 19, 2017

ख्वाब

नहीं पता कौन हो तुम

कि ख्वाबों  के आसमान से
अचानक ही हकीकत की जमीन पर
उतर आए हो तुम!

फिर भी ख्वाब ही क्यों लग रहे हो तुम!

नहीं जानती मैं सपने में हूँ
या सच को सपना समझ रही हूँ!

नहीं पता कौन हो तुम!
ख्वाब हो या हकीकत हो तुम!
- सीमा
#ख्वाब
#हकीकत

खुशबू

तुम अक्सर मुझे अकेला छोड़ देते हो
किनारों पर
और मैं बह कर तुम्हारे पास चली आती हूँ
कि तुम्हारा हर पता मालूम है मुझे!
कि तुम्हारी खुश्बू मेरे पास ही रहती है
और वो  हाथ पकड़ कर मुझे
पहुँचा देती है तुम तक!
मुझे पता है इसे पढ़ने के बाद
एक फीकी सी मुस्कान होगी
तुम्हारे लबों पे और
इसी मुस्कान पर मैं
मर - मिटती हूँ हर बार ॥

- सीमा

Tuesday, April 18, 2017

शून्य

मैं जब शून्य हो चुकी थी
तुम अंक बन के
मेरे पास आए।
अब लौटने से पहले
एक बार मुड़ के देख लेना
कि तुम्हारे कितने अंक
मेरे पास रह गए  हैं
पर तुम नहीं तो
ये अंक भी
शून्य  हैं
मेरे लिए
💝
- सीमा

Thursday, April 13, 2017

दु:ख की नदियाँ

हम सभी के पास दु:ख की
छोटी - छोटी नदियाँ हैं
आओ हम सभी
सागर में अपना दर्द बहा आएं
कि सागर का दिल
बहुत बड़ा है!
- सीमा

चिड़ियाँ

किसी कहानी में मैं हर बार
एक चिड़िया बनना चाहूँगी
कि चिड़िया होना
मुझे अच्छा लगता है।

जिंदगी छोटी ही सही
अपनी पसंद की हो
मैं चिड़िया बन कर ही
तुम्हारी कहानी का भी
हिस्सा बनुँगी!
तुम क्या बनना चाहोगे
ये तुम जानो!

- सीमा

खुशी

हम खुद को खुश करने के लिए
बनाते हैं एक तस्वीर।
हम खुद को
खुश करने के लिए लिखते हैं एक कविता।
सुनते हैं मनपसंद गीत-संगीत
अपने मन - मुताबिक दोस्त बनाते हैं।

खुद की खुशी के लिए बनते  हैं, सँवरते हैं।
खरीददारी करते हैं।

अपने फूलदानों में रखते हैं ताजे फूल
कि देख कर खुशी हो।

पालतू जानवर, पंछी सब हमारी ही खुशी से
रहते हैं हमारे साथ।
खुद को खुश रखना उतना ही जरूरी है
जितना जीने के लिए हवा और पानी!
फिर भी हम इसे रोज भूल जाते हैं।
- सीमा

Wednesday, April 12, 2017

ख्याल

मैं बेतहाशा भागती थी
ख्यालों में
कि वो मेरी पहुँच से दूर था!

मैं घूम कर लौट आती थी
अपने खुरदुरी सतह पर
और  महसूस करती थी
सिर्फ उसकी कोमलता!

- सीमा

Monday, April 10, 2017

प्रेम उदास है


तुम्हारे शब्द
कितने पवित्र थे ना
मैं हर बार कुछ और
माँग लेती थी।

उन दिनों हम दूर होकर भी
बहुत पास थे ।
तुम्हारी स्नेह और
प्यार भरी बातों से
मेरे अंदर पनपने लगा था प्रेम।
मैंने कितनी दफे
प्रेम के पाँव के
कोमल स्पर्श को
महसूस किया।

महीने चढ़ने लगे
बहुत दिनों तक
हमारा संवाद नहीं हुआ।

मैं खानाबदोश सी
तुम्हें ढूंढती रही
कहाँ,कहाँ!
झेलती रही तन्हाई!

वक्त की गोलाई बढी
मैने बड़े उदास से
दिखने वाले
समय को जन्म दिया।
बड़ा गुमसुम सा
रहता है वो।

तुम आओ और
इसे
अपना प्यार भरा
स्पर्श दो
कि
इतना हक तो है उसका
तुमपर
कि ये उदासी भी तो
तुम्हारी ही देन है!

- सीमा

Saturday, April 8, 2017

पेड़

मैंनें देखा है पेड़ों को करवटें लेते हुए
कि कभी-कभी उनका भी जिस्म अकड़ जाता है!
मैंनें देखा है उन्हें बाँहें फैला कर
अंगड़ाई लेते हुए,
सुबह की धूप में
खिलखिलाते हुए और
दोपहर की धूप में निढ़ाल होते हुए।
मैं पेड़ों को रोज निहारती हूँ।
उन्हें दुआएँ देती हूँ।

मेरे घर के ठीक पीछे खड़ा
पीपल का पेड़ अभी बहुत उदास है।
उसके सारे पत्ते झड़ गए हैं।
उसकी टहनियाँ नंगीं हो गईं हैं
वो हरी पत्तियों को
जल्द से जल्द लौट आने का
निवेदन कर रहा है!
पत्तियाँ जल्द  ही सज जाएगी टहनियों पर
पीपल चैन की नींद सोएगा कुछ दिन!
- सीmaa

Monday, April 3, 2017

बुदध

मैं जानती हूँ तुम समय से पहले ही समझदार हो गए थे
तुम्हें दुनिया की हर ऊँच-नीच नापनी थी,
तुम्हें अपने मापदंड बनाने थे,
दुनिया को बदलने की हिम्मत जुटानी थी!
तुम बुद्ध हो जाना चाहते थे!

तुम्हें रहस्यों के भीतर समाना आता है
और तुम  लौटते हो वहाँ से शून्य होकर
और मैं उसी शून्य में समा जाना चाहती हूँ हर बार
ताकि तुम्हें फिर से जिन्दा कर सकूँ!

Wednesday, March 29, 2017

पुराने पन्ने

कुछ निकलना चाह
रह था मेरे भीतर से
शायद वो फूल सा
कोमल होता,
शायद वो एक
सुंदर तस्वीर होती
पर मुझपर
बंदिशें लगती रही!

एक दिन खुद को
टटोलने बैठी तो
ढेर सारे सूखे फूल,
रंगों की टूटी हुई बोतलें
और कुछ भरभराई सी
आवाज़े निकलीं ।

मैंने मन की सतह को
साफ कर दिया
अब वहाँ बस
एक सूनापन है
अब वहाँ कुँवारे सपने नहीं !!
अब वहाँ हकीकत की
बंजर जमीन है!!!
- सीमा
(कुछ पुराने पन्ने)

Monday, March 27, 2017

कृष्ण

हाँ, वो कान्हा है
बिना मोर पंख वाला!
उसके हाथों में सुदर्शन चक्र नहीं,
उसके कानों में कुंडल नहीं
ना ही रंग सांवला है
पर वो कृष्ण का रुप है
और ये मेरे मन का वहम नहीं!
कहते हैं ना
पत्थर को भी पूजो तो वो
देवता बन जाता है
मैं भी मन ही मन पूजती हूँ उसे
पर मैं मीरा नहीं,
राधा नहीं
मैं सीमा हूँ
और वो मेरा असीम!
हाँ,
हम  सभी को एक कृष्ण चाहिए
अपनी जिंदगी में रंग भरने के लिए!
- सीmaa

कृष्ण

हाँ, वो कान्हा है
बिना मोर पंख वाला!
उसके हाथों में सुदर्शन चक्र नहीं,
उसके कानों में कुंडल नहीं
ना ही रंग सांवला है
पर वो कृष्ण का रुप है
और ये मेरे मन का वहम नहीं!
कहते हैं ना
पत्थर को भी पूजो तो वो
देवता बन जाता है
मैं भी मन ही मन पूजती हैं हूँ उसे
पर मैं मीरा नहीं,
राधा नहीं
मैं सीमा हूँ
और वो मेरा असीम!
हाँ,
हम  सभी को एक कृष्ण चाहिए
अपनी जिंदगी में रंग भरने के लिए!
- सीmaa

एक दिन

एक दिन जब मैं
बहुत उदास थी
सूखी पडी धरती पर
कुछ आँसू की बूँदें टपक पडी थी...
वहीं पर एक बीज दबा पड़ा था ..
नमी पाकर बीज ने अंगड़ाई ली।
वहफूट पडा।
वह रोज अपना रुप बदलता रहा
उसने पौधे की शक्ल ले ली।
  एक दिन उस पौधे में
कुछ फूल निकल आए।
पौधा सज गया।
धरती निखर गई।
अब एक साथ सब मुस्कुरा रहे हैं...
.... धरती, पौधा, फूल
और फूलों को देखकर मैं।
आँसू भी व्यर्थ नहीं जाते
कभी-कभी।
- सीmaa

रंगमंच

जिंदगी के रंगमंच पर!
---------------------------------------------
मैंने हमेशा जीना चाहा
एक अदाकारा की तरह
जो अपने हर संवाद
बखूबी बोलती हो
हर दृश्य को
भली भांति समझती हो।

जीती हो पल-पल को
जो अभिनय नहीं करती
बल्कि समा जाती हो पात्र में
जिसके अंग-अंग से झलकती हो
उसकी भूमिका।

हाँ, जिंदगी एक रंगमंच है
और हम सभी किरदार

पर मैं नहीं बन पाई
एक अच्छी  अदाकारा
मै तो हर वक्त
अटकती रही संवादों में
उलझती रही
बदलते दृश्यों के साथ ।

काश कि मैं हो पाती
एक अच्छी अदाकारा।
खींच लेती
कमजोर कहानियों को भी
अपने दमदार अभिनय से।
भर देती उनमें जीवंतता

और हिट हो जाती
जिंदगी के रंगमंच पे
एक और
जीवंत कहानी।
-सीmaa

Friday, March 24, 2017

उदासी

आज अचानक कहीं से
फिर लौट आई उदासी
सुबह फीकी-फीकी लगी
चिड़ियों की चहचहाहट का
कोई असर नहीं हुआ मन पर
फूल-पौधों को  भी निहारने का मन नहीं हुआ
ये उदासियाँ यूँ ही बेवजह नहीं लौटती होगी ना!
हमारी खुशियों को आराम देने के लिए
लौट - लौट आती हैं ये!
- सीमा

Sunday, March 19, 2017

तुम्हें नहीं पता

तुम्हें नहीं पता
मैं एक बार फिर से
सीख रही हूँ चलना!
हाँ, इस बार
मैं तुम्हारी नजरों से
देख रही हूँ दुनिया!

तुम्हें नहीं पता
मैं तुम में ही
उतर रही हूँ
धीरे-धीरे!

हाँ, मैं तुम में ही
ढ़ल रही हूँ
धीरे-धीरे!

- सीमा

Friday, March 17, 2017

खट्टी - मीठी बातें

कौन रहता है
मेरे साथ हमेशा....
...... तेरी बातें....
हाँ, वही बातें
जो थोड़ी सी खट्टी हैं
और थोड़ी सी  मीठी!
- सीमा

Friday, March 10, 2017

बिगड़ना - संवरना

हम खुद से
कितनी उम्मीदें पाल
बैठते हैं,

कुछ देख सुन के,
कुछ अपने शौक के,
कुछ अपने स्तर के,
कुछ अपनी सहुलियत के।

रोज भगाते हैं
अपने आसपास से
मक्खियों की तरह भिनभिनाती
नकारात्मकता।
रोज छांटते हैं
निराशा के बादल।

खुश होने के बहाने
ढूंढते रहते हैं
इधर-उधर से।

इतिहास,भूगोल,गणित
सबसे लड़ते -भिड़ते
निकालते हैं
अपने लिए
सुकून भरा चाँद
और सो जाते हैं
एक राहत भरी
सुबह की खातिर।

हम रोज उलझे हुए
बालों की कंघी करते हुए
देना चाहते हैं
उन्हें एक नया विन्यास।

हम रोज बिगड़ते हैं,
हम रोज संवरते हैं।
- सीमा

Saturday, March 4, 2017

फकीर

दिल फकीर हुआ जा रहा है
बस तुझे सोच कर ही झूम लेती हूँ!
- सीमा

पन्ना-पन्ना

चलो पन्ना - पन्ना दिल की किताब का हम पढ़ते हैं,
फिर थोड़ा और  उघड़ते हैं, थोड़ा बिखरते हैं!
- सीमा

Wednesday, March 1, 2017

क्रोध

निराशा को जगह
मत दो,
क्रोध उत्पन्न करो।

उन एक-एक
सिसकियों को
याद करो
जो देती रही घुटन,
उस एक-एक
तिनके में
आग लगाओ
जो भेदते रहे तुम्हें।

निराशा को जगह
मत दो,
क्रोध उत्पन्न करो।
    -  सीमा

अनसुनी

तुम हर बार
अनसुनी करते रहे
अपनी छटपटाहट को,
तुम हर बार
पनाह देते रहे दर्द को
बहुत कचरा
जमा हो गया ना!
अब एक ही
रास्ता है
या तो खुद को
दफन कर दो
या बिखरा दो
दर्द का हर हिस्सा
कि
जहाँ से आया था
ये वहीं चला जाए वापस !
- सीमा

प्रेम

प्रेम का पौधा
***********
प्रेम का पौधा
बड़ी तेजी से
सूख रहा है,

कुछ फूल आखिरी
सांस ले रहे हैं।

समय पर टकटकी लगाए
खड़े हैं यम।

कुम्हलाए हुए
फूलों का रंग और भी
सूर्ख लग रहा है।

ओह! दुनिया का सबसे
प्यारा शब्द लुप्त हो रहा है।

लोभ,छल,मद बेफिक्री से
घूम रहे हैं।
सौंदर्य और धन के
चारों ओर इकट्ठा लोग
ठठा रहे है और
प्रेम प्यासे लोग
जिंदा लाश से बस
जी रहे हैं।

प्रेम तुम्हारी मृत पड़ी देह को
मैं यूँ मिटने ना दूंगी ।
मैं तुम्हारी आत्मा को रोज
बुलाऊँगी।
अब आत्मा से आत्मा का
एकाकार होगा।
प्रेम ,तुम फिर जन्म लेना
प्रेम बनकर।
- सीमा

Tuesday, February 28, 2017

सूरत

चेहरा बदल रहा है
धीरे-धीरे!
अब लोग मुझे परखेंगें
तुम्हारे हिसाब से
सोचती हूँ अब
नकाब में रहूँ
कि कोई बेनकाब ना
कर पाए मुझे!
हाँ,
आजकल तुम्हारी सूरत
नजर आने लगी है मुझमें!
- सीमा

Sunday, February 26, 2017

मुट्ठी भर प्रेम

मौन था तेरा प्रेम
कि उलझनें बहुत थी तेरी राहों में और
कांधे जिम्मेदारियों से भारी थे
अपने सपनों को कच्चा - पक्का पका कर
तुम कभी सुस्त, कभी तेज
चले जा रहे थे और
मुट्ठी भर मेरा प्रेम भी रख लिए थे
अपने साथ!
मैं भी बस इसी बात से खुश हूँ कि
तुम्हारे पास ही हूँ मैं!
- सीmaa

Saturday, February 25, 2017

साक्षात्कार


उन दिनों जब उसमें इतनी शक्ति थी कि
वो विद्रोह करती उसने
सहनशीलता के पाठ को पढना जारी रखा।
सहते - सहते एक दिन उसकी सारी शक्तियाँ खत्म हो गई
अब वह दुनिया में अर्थ ढूंढ रही है अपने जिंदा होने का।
किसी ने उसे कर्मो का लेखा - जोखा  पढ़ाया
उसने संतोष कर लिया।
पर कुछ दिनों से फिर बगावत के कुछ राग
उसके आसपास मंडरा रहे हैं
इस बार वह उसे व्यर्थ नहीं जाने देगी
इस बार सारे सवालों के जवाब वह पाकर रहेगी
ऊपर वाले तुम तैयार हो ना
कि इस बार साक्षात्कार की बारी तुम्हारी है।
- सीमा

Friday, February 24, 2017

जुर्म

जुर्म था तेरा पास आना
अब दूर जाना  दूसरा गुनाह होगा!
- सीमा

पन्ने

कुछ पन्ने फड़फड़ाए थे!
हवाओं ने उन्हें गुदगुदाया था।

किताबों को बंद करके दबा दिया गया!
- सीमा

   

पलाश


पलाश
#####
राह चलती एक स्त्री
अचानक ही थम जाती है
जब पलाश के पेड़ से उतरकर
एक फूल सीधे उसके जूड़े में
अटक जाता है!

उसका  सादा पड़ा चेहरा
दमकने लगता है!
पलाश का फूल
मुस्कुराता  है कि

जीवन में रंग भरना
आता है उसे!
वो रंग देकर चला जाता है!

जब मौसम करवट लेता है
तो पलाश नजर नहीं आते पर
उनके रंग हमेशा याद आते हैं!
- सीमा श्रीवास्तव

धूल - जाले

घर के धूल - जाले झाड़ते हाथ
सहसा रुक जाते हैं
जब
एक औरत
अचानक देखती है
अपना मुरझाया सा चेहरा!
अपने मन में बैठे जाले को भी वो
साफ - साफ देख पा रही है आईने में!
- सीमा

Thursday, February 23, 2017

केंचुल

अपने जीवन के किसी एक पड़ाव पर
अक्सर औरतें बदलती हैं अपना रुप
अपनी देह पर चिपके केंचुल को
झटक कर वे
आगे बढ़ती हैं और
आईना हैरान रह जाता है
उनकी सूरत देखकर!
- सीmaa

Monday, February 20, 2017

कहते-सुनते

कहते -सुनते
बड़ी हो गई मैं,

सहते-सहते
बड़ी हो गई मैं,

कितना समझा
कितना  जाना

फिर भी  रहा
बहुत कुछ अनजाना।

सब की परिभाषाओं को पढ़ते
आकर कहाँ खड़ी
हो गई मैं।

बहुत कुछ
छोड़ आई मैं पीछे

बहूत कुछ समेट रक्खा है
खुद में।

कितनी बार गिरी हूँ
देखो
फिर भी तन के
खड़ी हो गई मैं।

रोते-रोते बड़ी
हो गई मैं,
हॅसते-हॅसते बड़ी
हो गई मैं।।

- सीमा

Saturday, February 18, 2017

परछाई

अपनी परछाईयों से
भागते हुए
किसी से टकरा जाते हम एक दिन
और फिर उसे थाम कर
बैठ जाते हैं।
फिर आसपास क्या चल रहा है
नहीं दिखता।
अपनी परछाईयाँ भी
तब गायब हो जाती हैं।
हम वही थम जाते हैं
और वक्त रुक जाता है मानो!
- सीमा

Thursday, February 16, 2017

वसंत

बौराती हैं तितलियाँ,
मुस्काते हैं फूल

ठहरता कहाँ है पर
मौसम वसंत!
- सीमा

Tuesday, February 14, 2017

इजहार

कुछ लड़कियाँ अपने प्रेम को
चीनी के डब्बों में छुपा कर रखती हैं
चाय की पत्तियों के साथ उबाल कर कत्थई कर देती हैं,
गमलों की मिट्टी में मिला देती हैं
कि फूलों का रंग चटक हो!

कुछ लड़कियाँ बस इंतजार करती हैं
कि वो इजहार नहीं कर सकतीं!
- सीमा

Sunday, February 12, 2017

इंसान

तपाया है खुद को
इसलिए दमकते हैं!

कुंदन नहीं इंसान ही हैं!
- सीमा

हकीकत

चुन लो कोई ख्वाब
कि जिंदगी एक हकीकत है!
- सीमा

Saturday, February 11, 2017

बिंदु

जब भी ध्यान स्थिर करती हूँ
तुम एक बिन्दु बन कर चले आते हो!
- सीमा

वादा

क्या करूँ कोई वादा खुद से निभा नहीं पाती हूँ
सोचती हूँ कि अब ना सोचूँगी तूझे
पर हर बार तुझे ही सोचती चली जाती हूँ!
-सीमा

Friday, February 10, 2017

स्त्री

एक ही दिन में
नदी, झील, समंदर
कितने रुप
धर लेती हूँ मैं....
.. हाँ स्त्री  हूँ मैं.......!
- सीमा

गुलमोहर

गुलमोहर की लालिमा देती मन भरमाए

छाँव उसकी बैठ कर लेते सब सुस्ताए

है गुलाब सुन्दर बहुत पर
रहते हम इससे दूर

काँटो वाले  तन हैं इसके
देता घाव लगाए!
- सीमा

नदी

पूछना उस नदी से कि ठहरा हुआ
जल कैसा दिखता है!
  फिर भी ना जाने किसके इंतजार में
कभी - कभी रुक जाती हैं नदी!

Thursday, February 9, 2017

उम्मीद

! नदी बन जाना चाहते हैं जज्बात
ये बहते हैं तो रूकते ही नहीं!

उम्मीदें हर बार बढ़ती ही चली जाती हैं!
- सीमा श्रीवास्तव

अक्स

हाथ से छूटा आईना और गिर गया देखो
अक्स मेरा जो था कैसे बिखर गया देखो!
   

यादें


यादों की नदी से बाहर तो आ जाती हूँ
पर किनारों पर बहुत फिसलन है
मैं फिसल कर फिर पहुँच जाती हूँ तुम तक!

जादू

सारा जादू तुम्हारी मुट्ठियों में बंद था...
... अब वो हवाओं में बिखर गया है

पर हवाएँ कहाँ रुकती हैं किसी के पास भला!

खत

जब खत लिखती हूँ तेरे नाम से
तुझको पढ़ लेती हूँ फिर से!
- सीमा

कोशिश

         एक कोशिश तुमसे दूर  रहने की
एक कोशिश इस कशिश को बरकरार रखने की!

Wednesday, February 8, 2017

इंतजार

          बड़ी उम्मीदों की रात थी वो
           काली थी काली ही रही

तेरे इंतजार में हुई सुबह भी  अंधियारी ही लगी!

Sunday, February 5, 2017

खत

तुम्हारे खत कभी पुराने नहीं दिखते
उनकी खुशबू भी कागजी नहीं बिल्कुल

कुछ खत इत्र की मानिंद महकते हैं!
- सीमा

चाहत

चाहतों का समंदर
सो गया है कहीं
बस नदी सी
अब बहना
चाहती हूँ।

- सीमा

Saturday, February 4, 2017

अक्स

हाथ से छूटा आईना और गिर गया देखो
अक्स था मेरा जो उसमें कैसे बिखर गया देखो!
   

Thursday, February 2, 2017

लकीरें

बैठे ,बैठे अचानक याद आ गया वह खेल

जिसमें हम लकीरें खींच आते थे
अलग- अलग  जगहों पर

और फिर शुरू होती थी
एक दूसरे की खींची लकीरो को
खोजने की बारी ।
जो जितना कम समय लगाता खोजने में
वो जीत जाता ।

हम सभी जल्दी ,जल्दी   काटते थे
एक ,दूसरे की खींची लकीरें !

ये लकीरों को काटना
सचमुच  खेल था या
इसमे छिपी थी कोई  सच्चाई ।

कहीं ना कहीं हम सभी
एक दूसरे की खींची लकीरो को
काटते नहीं रहते क्या और
कभी-कभी कुछ
खींची हुई लकीरों के पार भी
जाना चाहते हैं कुछ लोग खेलते-खेलते।

- सीमा श्रीवास्तव