Tuesday, September 30, 2014

                  मौन 
         () () () () () () () 

तुम्हारे बोलने का तरीका ,

सोचने  का  पैमाना 

बहुत अलग है मुझसे 

तुम ना बोला हुआ भी 

सुन लेती हो अक्सर ,

अपने मन से लगा लेती हो अटकलें ,

अपने विचारों  को ही देती हो अहमियत ,

अपने व्यक्तित्व का ही 

जमाती हो हरदम रौब और 

फिर मैं ना चाहते हुए भी,

बोल जाती हूँ कुछ अटपटा 

चलो अच्छा है ,

कुछ दिनों का मौन धरते हैं 

और उन पलों मेँ एक दूजे को पढ़ते हैं !!!


सीमा श्रीवास्तव 






सन्नाटे की आवाज



रात को सोया हुआ आदमी ,

बार  बार जगता है ,

चौंक चौंक कर उठता है । 

रात के सन्नाटे में हैं 

ढेर सी आवाज़े ,

आवाज़े ,जिन्हे वो नहीं पहचानता 

दिन के शोरगुल में ……… 

 सो नहीं पाता वो सारी रात 

 उन अनजानी आवाज़ों को थाहने मेँ 

सुबह होती है और वो अलसाया सा 

पसर जाता है बिस्तर पर 

सुबह के शोरगुल मेँ छोटी छोटी

 अनजानी  आवाज़े खो जाती हैं …… 

तब  सो जाता है वह 

आराम से , दुनिया   से  बेखबर 

अपनी जानी पहचानी

 आवाजों की दुनिया मेँ । 

सीमा श्रीवास्तव 

(मेरी एक बहुत पहले की रचना जिसे मैंने अपने  अनुभव के आधार पर लिखा था )







Monday, September 29, 2014

मन

            * शब्दों की आवाजाही *
              +++++==+++++

लिखते हैं ,मिटाते हैं । 

क्या कहें कागज़ पर 

कुछ शब्द ही सही 

नजर आते हैं ,

पर मन में ये जो 

शब्दों की आवाजाही है 

उन्हें कैसे मिटाऊँ ?

कैसे कुछ शब्दों को 

बाहर का रस्ता दिखाऊँ 

मन की सतह को साफ़ 

कर पाऊँ कैसे ?

प्रभु कहो तुम तक 

पहुँच पाऊँ  कैसे ?

सीमा श्रीवास्तव 


                घर 
       <<<>>><<<>>>

हर घर कुछ कहता है ,

पर ये भी तो है  कि  घर में 

 कोई एक ही तो 

नहीं रहता है । 

हर सदस्य की चहल पहल की छाप 

पड़ती  है घर पर 

कि मुश्किल है इसे  सजाना 

किसी एक के दम पर

चीजें यहाँ   हर पल 

 बनती हैं,

बिगडती हैं 

घर अपने लोगों से  ही 

 सजती हैं ,

सँवरती है । 

सीमा श्रीवास्तव 



Sunday, September 28, 2014

बेटी दिवस

        बेटी दिवस 
<<<<<****>>>>>


अब लड्कियॉ भी पैदा होती हैं

मॉ बाप के सपनो के साथ्।

उड्ती फिरती है तितलियो कीतरह।

हॅंस  हँस  के बतियाती है 

दौड्ती फिरती है अपने मनपसंद कपडो मे।

परदे के ओट मे नही रह्ती छिप के बैठी,

बल्कि बेनक़ाब करती है,हर 

नक़ाबपोश को।

और गालियॉ देते हुए धकेल देती है

अपने पीछे पडे  लफंगो को...

सीमा श्रीवास्तव

गौरैया

                     गौरेया 
       <<<<<<<^ ^ ^ >>>>>>

मेरा बचपन गौरैयों के साथ ही बीता । 

ढेर सारी ,कभी इधर से ,

कभी उधर से उड़ती और 

 आपस में ही लड़ पड़ती 

(ज्यादा  होने से लड़ाई भी
 हो जाती है )

तब मैं भाग के जाती ,

हट !कर के उन्हें भगाती 

वो फिर कहीं बैठ कर 

जोर जोर से चिल्लाती । 

मेरी पढ़ाई में भी ये 

ड़ाल देती व्यवधान

जब एक साथ मिलकर  

करने लगती थीं समूहगान 

पर अब गौरैयों का शोर 

नहीं बटाता ध्यान 

 अब तो उनकी 

ची ची   भी सुनने को 

तरस जाते हैं कान 

अरे ! ये तो हो गया कमाल 

देखो जाने कहाँ  से एक गौरैया 

आ गई है 
 उड़ के  

चलो इसे सुरक्षित करें 

और न होने दें इन्हें विलुप्त 

सीमा श्रीवास्तव 




ज्वारभाटा

        ज्वारभाटा 
****************

एक चाह  तब ख़त्म हो 

 जाती है जब नहीं रह जाते  

 सही रंग ,सही शब्द ,सही लोग

और हौसला,

हाँ  हौसले को तो ख़त्म 

कर देता है …....... 

बार बार उठता ज्वारभाटा, 

जो मन की सतह को 

तहस नहस कर जाता है 

और छोड़ जाता है अंदर की 

गन्दगी को बाहर ,मिटा देता है 

बरसो की सारी सजावट ,

और मचा देता है एक 

ऐसी उथल पुथल कि 

समेटना मुश्किल हो जाता है 

खुद को ....... 

सीमा श्रीवास्तव 

Friday, September 26, 2014

बेकसूर

        बेक़सूर 
*************


उड़ जाती  हूँ   कभी  कभी 

मन  की उड़ान के साथ 

इस खारे समुन्दर से बहुत ऊपर 

परिंदो वाले नीले चादर पर 

चलाती हूँ   हुकूमत चाँद तारों  पर 

और करती हूँ कभी कभी 

 अपनी  मनमर्जी 

जिसे वे  ख़ामोशी से  सुनते हैं 

तब हँस  पड़ती हूँ मन ही मन.…  

पर अचानक ही दिख पड़ते हैं 

कुछ उदास से सहमे हुए तारे 

तो करने लगती  हूँ  अफसोस 

कि आखिर गलती क्या है इनकी 

जो इनपे करूँ मैं मनमर्जी 

देखो तो ,कितनी खूबसूरती से 

ये हँसते मुस्कुराते हैं  

और सीखाते  हैं हमें भी

 हँसना मुस्कुराना 

तब क्यों चलाऊँ  इनपर 

मै अपनी हुकूमत 

क्यों  अपने गुस्से को 

उतारूँ एक  बेक़सूर पर !!

सीमा श्रीवास्तव 


Wednesday, September 24, 2014

प्रार्थना

           प्रार्थना 
    ************

मेरी शक्ति को खा जाते हैं ,

भाग्य चक्र ,संयोग ,नियति 

काल डसते हैं और मृत्यु सहमा जाती है 

इसलिये हे शक्ति !  हम तुम्हारा आहवान

करते हैं 

तुम आओ ,मुझमे समाओ ,

आशंकाओ को दूर भगाओ। 

भय को ध्वस्त करो ।

हमारी शक्ति की एक सीमा है  

तुम्हारी शक्ति की कोई सीमा नहीं ,

जिंदगी के मँझधार मेँ फसे हम 

तुम्हारा आहवान  करते हैं। 

भाग्य ,संयोग की लड़ियों से मुक्त कर 

हम मेँ  नवजीवन का संचार करो 

हे शक्ति! हम तुम्हारा आहवान  करते हैं,

हे शक्ति ! हम तुम्हेँ नमस्कार करते हैं। 


सीमा श्रीवास्तव







पिछले पन्ने



चलो अच्छा हुआ कि 

पिछले पन्ने उलट 

 लिये उनके वरना
 
हम तो उन्हें अपना ही 

समझ बैठे थे.....

सीमा श्रीवास्तव.

पिचले

स्वर्ग



लोग अपने अपने 

घरों को सजाते हैं और 

चारो तरफ पसरे

 नरक मेँ,

अपना एक छोटा सा 

स्वर्ग बसाते हैं !!

सीमा श्रीवास्तव 

संकल्प

    संकल्प 
*********

रोज हम कुछ नया 

संकल्प बुनते हैं

उठाते हैं डायरी 

फाड़ते हैं पुराने पेज 

और लिख देते हैं

खाली पन्नों पर 

अपने नए ख्यालात 

फिर खुश हो लेते हैं मन ही मन । 

थोड़ी देर उस पर 

इतराते हैं और 

दूसरे ही दिन अपने 

पुराने रूटीन पर 

चले आते हैं 

सीमा श्रीवास्तव 

लक्ष्मण रेखा

  लक्ष्मण रेखा
*……………*

मेरे संस्कारो की 


लक्ष्मण रेखा नही


छोडती मुझे कहीं भी


कि उसके अंदर रहना

मेरी नियति नही,

मेरी मजबूरी नही,

मेरी खुद की चुनी

हुई राह है..।

क्यूँ  भटकती मैं

उससे बाहर

हॉ हर पल है

वह है मेरे अंदर

मैंने खुद ही

खिची है यह रेखा 

तुम कहते हो जिसे

लक्ष्मण  रेखा! 

सीमा श्रीवास्तव 

भावना

              भावना 
…… .......... ....... … 

     वो    खींच रही थी ,

बेमन से   आड़ी तिरछी रेखाएँ ,

       लोगों ने इसे

 दुनिया के रस्ते समझ लिए।
 

सीमा श्रीवास्तव 

Tuesday, September 23, 2014

माँ की रोटियाँ



माँ के हाथों से बनीं 

टेढ़ी मेढ़ी रोटियाँ 

जिन्हे परस कर 

माँ को भी होती  है
 तकलीफ ,

बच्चे खा लेते हैं प्रेम से 

क्योकि माँ ने बनाया

 होता है, उन्हें प्रेम से 

अपनी अस्वस्थता की
 हालत में भी.......


बच्चे बड़े  हो  जाते हैं ,

हर तरह की रोटियाँ खा के 

और फिर  जब उन्हें 
 नहीं मिलती 

घर से बाहर 

माँ के हाथो सी नरम  रोटी 

तो  वे  उदास   नहीं होते

क्योकि माँ ने सिखाया होता है 

टेढ़ी मेढ़ी रोटियों को भी 

खा लेना ,पेट भरने के लिए ।  

- सीमा श्रीवास्तव



Monday, September 22, 2014

मेरी कविता

    मेरी कविता 
,,,,,,,,,,,....... ,,,,,,,,,,

मेरी कविता ,नहीं ले   जाती मुझे 

झरनो - पहाड़ो पर 

 ना  ही धरती से दूर 

उन चाँद - तारो पर 

अपने आस पास ,

इर्द- गिर्द कितना कुछ 

अनछुआ रह जाता है 

और हम विचरते है 

नदियों,  झरनो,  पहाड़ो पर ,

गढ़ते है कहानियाँ

....   चाँद  - तारो पर 

पर मै सहज भाव से

लिखना चाहती हूँ 

अपने आस पास के 

अनछुए सुख- दुःख 

जिसे ना चाँद ने 

समझा ना तारों ने 

ना झरनों ने महसूस 

किया  ,ना पहाड़ो ने !!

सीमा श्रीवास्तव 


घमंड

      घमंड 
…… **........

चाँद को कुछ इतना 

सराहा मैंने कि

 तीसरे दिन ही वह 

टेढ़ा नजर आने लगा । 

सीमा श्रीवास्तव 




रिश्ते

      रिश्ते 
.......................

बहुत सहलाया कुछ 


रिश्तो को हमने

समेट लिया हाथो को

जब ये दुखने लगे

अपनी नींद भी तो

पूरी करनी है सीमा

छोड़ो अब दूसरे


सोये या जगे! 


सीमा श्रीवास्तव

लोगों का क्या

  लोगो का क्या है..?
..........*..............
  

मुझ पर भी कितने
लोग जाते हैं हस के 
चले जाते हैं

जब कभी दिख जाती हूँ मैं उन्हें 


पसीने से तरबतर चेहरे मे या
बिखरे हुये बालों मे


 या बिन मैचिंग दुप्पटे में,
हरबडाई सी खोलती
दरवाजे को,

कभी ड्राइंग रूम के बिखरे
कुशन पे  हंस देते है,


कभी किचेन मे
फैले बर्तनों पे चुटकी लेते है....

लोगो का क्या है..! 


अचानक ही तो घुस आते है,
किसी की भी जिंदगी में अधीर से


और जो दिख पडता है.उससे
ही गढ लेते है आपकी एक तस्वीर...


सीमा श्रीवास्तव 

अंतर के वासी

     अंतर के वासी 
………… *…….......  

ये  कागज पर जो बिखरे हैं.


मन के आँगन मे निखरे हैं! 


नहीं इनकी कोई जात- पात,


मेरे एह्सासों के टुकडे है.


हैं मुझसे ये, मैं इनसे हूँ


मेरे अंतर के वासी ये 


हर पल इनको पुचकारूँ मैं


शब्दों के प्यारे मुखरे हैं! 


सीमा श्रीवास्तव 

राखी

राखी 


…… 

जाने क्यों 

भावशून्य हो 
 जाती हूं मै
राखी के नाम पर...


हाँ मैं नही 
समझ पाती कि 

अगर वो मेरे भाई है
मेरी इज्जत उसकी
इज्जत है तो फिर
क्युं वो देखता है
मेरी ही तरह
दूसरी बहनो को
गंदी नजरो से

सोचो सोचो,क्यूं
बाकियो को तौलते हो
तुम अपने,नजरो के
तराजू पर...
टटोलते हो उसके
दिल और दिमाग को
शब्द को अपशब्द
बना डालते हो और
अपनी बहन को छोड
सब पर बुरी नजर
डालते हो...?


सीमा श्रीवास्तव 

रचयिता

रचयिता
.............


एक ही भाव से

रचा होगा 

रचियता ने

हम सब को

पर देखो ना

हम सब है ,

कितने अलग अलग

हॉ,कुछ कविताओ के 

भाव एक ही 


होते  हैं  

पर हर एक


शब्दो का प्रयोग


करता है अपने अपने 


 ढंग से



 और फिर

एक ही भाव पर लिखी 


कविताएँ दिखती हैं ना 


कितनी अलग अलग !!



सीमा श्रीवास्तव

Friday, September 19, 2014

दर्द की दास्तान




एक दर्द समेट  लाता है

उन शेष दर्दो को भी

  जो समय समय पर

 देते रहे हैं  दंश

फिर 

उठती है

एक जोर की आँधी!

गम का गर्द

बिखर जाता है चारो तरफ

और

बरसता है आँखों से पानी!

गम  दूर बह  जाता है

और  छोड़ जाता है  नमी

 समय के झोखे सोख

लेते है वो नमी!!


दर्द की आंधी यूँ ही

उठती रहती है

 आँसू बरसते  हैं

फैलती है नमी

और समय के झोंखे

 सोख  लेते  हैं

 उस नमी को!!


सीमा श्रीवास्तव



  
        छोटे मोटे
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सवालो के  पीछे

सवालो से  ऊपर

कुछ बाते  ऎसी है

जिनका जवाब नही होता



खोलता   अतीत के दरवाजे

पसीने से तरबतर चेहरा




 हर दिन जख्म

देता  है नया

शुक्र है मैंने

किसी से प्यार

 नही किया



दुःख तो नसों मे

बह  रहे खून की तरह

 रहता है छुपकर

ज़रा सी धार लगी नहीं

कि टपक जाता है

 बूँद बूँद बनकर


सीमा श्रीवास्तव







Thursday, September 18, 2014

शब्द



एक पल को निःशब्द

भले हम हो जाए कभी

फिर भी शब्द हमेशा

देते है हमारा साथ

कुछ जुबां  पर आ जाते हैं

कुछ अंदर ही  अंदर

उमड़ते  घुमड़ते हैं


हर वक़्त कितने ही

शब्द चलते रहतें है

हमारे साथ साथ


सवालो मेँ ,जवाबो मेँ

प्रार्थनाओं मेँ,दुआओ मेँ

ये शब्द ही तो है जो

दे देते है कभी धोखा

और जिंदगी के

 कटघरे मेँ खड़े हम ,

हार जाते हैं

एक सुलझता हुआ केस


शब्दों की चोट ,

शब्दों की क्रांति से

बच के दिखाओ तो जानें

सीमा श्रीवास्तव



जिम्मेदारी का बोझ

       जिम्मेदारी का बोझ
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मैंने महसूस किया है

अपने दर्द से इतर

पुरुषों का भी  दर्द

कि  कैसे उनकी

ख्वाहिशें ,उनकी

जिम्मेदारियों तले

दब जाती हैं, कि

जिस चेहरे पर कभी

सजती थी मुस्कान

उस चेहरे की रौनक

चली जाती है

हाँ, एक अंतर्मुखी

पुरुष भी बहुत घुटता है

अंदर ही अंदर.....जब .

वह नहीं बाँटना चाहता

अपने दुःख , 
वह ओढ लेता है

झूठा चेहरा सच के चेहरे के ऊपर

मय  के चार घूँट से वो

दर्द के  दस घूंट

दबा जाता है

अपने घर वालो के खातिर

अपने खून को  बेच

आता है ……

सीमा श्रीवास्तव


Monday, September 15, 2014

ध्यान

1         दायरे

दायरे समेट

     लिए हैं

     मैंने अपने

कि तुमको पाकर

किसी और की

जरूरत जो नहीं

सीमा श्रीवास्तव


2

तुम मिलो न मिलो

कोई फर्क नही है अब

कि  मै मिल चुकीं हूँ

अपने आप से  जब

सीमा श्रीवास्तव 

रोज

       
 रोज रोज

  1

  रोज रोज मुझको ये

जिंदगी सिखाती है

  हौसला खुद के पीठ

थपथपाने  से आती है

2
   
   रोज कुछ न कुछ

नादानी हो जाती है
   
  जब भी अपनी तबीयत

कुछ बचकानी हो जाती है

सीमा श्रीवास्तव 

हौसला



टूट चूके हो  ना

पर हिम्मत मत हारो

 मैं जानती हूँ एक दिन

तुम फिर उठोगे

ज़ोड़ोगे खुद अपने

टूटे हिस्से को

और झाड़ के सारी

बलाओ   को ,

आगे बढ़ोगे।


जोड़े हुए हिस्सों के

निशान तो नही मिटेंगे

दर्द भी दस्तक

 देता रहेगा बार बार

पर तुम बिखरोगे नही दुबारा

ये मेरा विश्वास है


हौसला ,हिम्मत ,उम्मीद

ऐसे ही  बहुत सारे शब्द

है अब तुम्हारे पास

और  साथ ही मेरा

आशीर्वाद भी।


सीमा श्रीवास्तव




काश ऐसा होता

                    काश ऐसा होता
               ……………………

काश  ऐसा होता  कि

किसी अच्छे पल के साथ

ठहर जाते हम

उसे थाम  के रखते ,

वहीं होती हमारी  दुनिया

  रच बस जाते हम वहीं। 


फिर चल देते एक दिन वहॉ से

उस परम दुनिया में और

ईश्वर को सुनाते

उसकी प्यारी दुनिया की

मीठी मीठी बातें

कि नहीँ होती हमारे पास

कोई कड़वी कहानी

दर्द ,घाव ,निराशा 

  होती बस आशा ही आशा

और जिंदगी जीने की लालसा

तब  फिर से इस दुनिया में

आने की ललक होती! 


सीमा श्रीवास्तव 

फूल



कितने कांटो के बीच

खिलते है कुछ गुलाब।

कई कंटीले बाडे से घिरे

जी रहे है हम सब भी

कभी खिलते है,

कभी मुरझाते हैं

किसी रात सोते हैं

किसी रात जगते हैं

फिर भी सुबह होते ही

फूलो की तरह

मुस्कुराते हैं।

सीमा श्रीवास्तव 

Sunday, September 14, 2014

संस्कार


                                             संस्कार 

बाहर की मिट्टी
घर को केवल
लिपा करती है,
नई रंगत देने के लिये
पर उस घर की
मिट्टी की तहों में तो
होती है अपने जगह
का असर,
अपनी महक
अपना छाप,
तो कितनी भी
चढाओ दूसरी मिट्टी के लेप
वो घर अपनी
मिटटी की ही
महक देता है.....

  सीमा श्रीवास्तव...
(यूं ही मन में उमडा एक ख्याल )


Saturday, September 6, 2014

शब्दों के मुसाफिर

                  शब्दों के मुसाफिर

किसी कवि की कविता

 एक नाव  होती है

जिसमे शब्दों के मुसाफिर

अलग  अलग भाव लेकर

आते जाते   रहते है ,

तय  करते  रहते   है

अपना   सफर ,

कहते रहते है

 अपनी अनकही  कहानियाँ ।

 उन मुसाफिरों की  वही

समझ सकता है ,

जो पढ़ सकता है

उनके दिल  की भाषा

नही तो  बाक़ी हँस देते है

कुछ फब्तियाँ कसते हैं

और जो नहीं समझ पाते

वो अनदेखा करके

चले जाते है। .......

सीमा श्रीवास्तव

edited..

कवितायें
होती हैं एक नाव सी
जिसमे शब्दों के मुसाफिर
अलग अलग भाव लेकर
आते जाते रहते है ,
तय करते रहते है
अपना सफर ,
कहते रहते है
अपनी अनकही कहानियाँ ।
उन मुसाफिरों की वही
समझ सकता है ,
जो पढ़ सकता है
उनके दिल की भाषा
नही तो कुछ हँस देते है
कुछ फब्तियाँ कसते हैं
और जो नहीं समझ पाते
वो अनदेखा करके
चल देते है। .......
सीमा श्रीवास्तव

Tuesday, September 2, 2014

40+

             40  +

छरहरी   काया पर

अभिशाप सी चढ़ चुकी

चर्बियाँ ,चिढ़ा रही हैं

आँखों के नीचे  के

काले  निशान और

ऊपर ऊपर से झलकते

सफ़ेद बाल ,सब  कुछ

चिल्ला चिल्ला के

कह रहे हो मानो कि

तुम कर दो खुद को

अब उम्र के हवाले

सीमा श्रीवास्तव


Monday, September 1, 2014

प्रकृति

                                                                          प्रकृति


प्रकृति...
तुम ना जाने
कितने रूप,
कितने रंग,
कितने भाव
समेटी हो खुद मे...


प्रकृति..
तुम, निस दिन
नये रूप धरती हो
कितनी चंघलता 
है तुम मे..


हम खुद को
रोज सवारते हैं
तुम रोज ही
कर देती ही..कुछ
इधर उधर

कुछ नया
रचने के लिये,
कुछ नया
पाने के लिये,


तुम कितने
परदे गिराती हो,


कितने चरित्र
निभाती हो..!!

सीमा श्रीवास्तव 

इन्द्रधनुष

                                 इंद्र्धनुष



इंद्रधनुषी रंगो सा

सतरंगी मन


पूरे दिन

सात रंग बदलता

बन जाता है

इंद्रधनुष सा      

कभी विचलित

कभी सहमा,

कभी निडर 

सा कुछ लम्हा

अपनी सीमाओ के

अंदर,दौडता,भागता,

उछलता मन

थक तो है जाता

पर रहता है हरदम

रंग बदलता....

सीमा श्रीवास्तव